नमस्कार दोस्तों! आपका स्वागत है हमारी इस खूबसूरत पोस्ट “Mirza Ghalib Shayari” में। Mirza Ghalib की शायरी सिर्फ शायरी नहीं होती ये उन लम्हों को बया करने का तरीका है जिन्हें हम बोल नहीं सकते। Mirza Ghalib की हर एक को Shayari को पढ़के आपको मोहब्बत, दर्द, और तन्हाई का एहसास होगा।
Mirza Ghalib की Shayari में जिंदगी को गहराई से जीना और सुकून सिखाती है। Mirza Ghalib की हर Shayari में जिंदगी का मतलब, प्यार और उसे पढ़कर आपको सुकून महसूस होगा।
उनकी Shayari हमे सिखाती है कि इस दुनिया खुस रहता है जो हर हाल में मुस्कुराता है। उनकी शायरी यह भी सिखाती है कि कभी दिल टूटने पर उम्मीद का दिया जला लेना चाहिए, और कभी प्यार और मोहब्बत में खोकर भी खुद को फिर से पाना पड़ता है।
अगर आप ऐसी Shayari खोज रहे हैं जो दिल को सुकून दे, दिमाग को सोचने पर मजबूर करे, तो यह पोस्ट आपके लिए सबसे सही जगह है। इस पोस्ट में आपको Mirza Ghalib की Famous, और खूबसूरत Shayari के अलावा आपको यहां पर खूबसूरत Photos भी मिल जाएंगे। जिसे आप Download कर के किसी भी Social Media Platform पर Upload कर सकते हो।
Famous Mirza Ghalib Shayari

रहने दे मुझे इन अंधेरों में, “ग़ालिब”…कमबख्त रौशनी में “अपनों” के असली चेहरे सामने आ जाते हैं।
आतिश -ऐ -दोज़ख में ये गर्मी कहाँ
सोज़-ऐ -गम है निहानी और है।
बारह देखीं हैं उन की रंजिशें ,
पर कुछ अब के सरगिरानी और है।

खुदा के वास्ते पर्दा न रुख्सार से उठा ज़ालिम.!
कहीं ऐसा न हो जहाँ भी वही काफिर सनम निकले..!!
ऐ बुरे वक़्त ज़रा अदब से पेश आ ,
क्यूंकि वक़्त नहीं लगता वक़्त बदलने में …
कितना खौफ होता है शाम के अंधेरूँ में,
पूँछ उन परिंदों से जिन के घर्र नहीं होते ..!!

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता।
हम कहाँ क़िस्मत आज़माने जाएँ
तू ही जब ख़ंजर-आज़मा न हुआ
कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रक़ीब
गालियाँ खा के बे-मज़ा न हुआ
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।
Mirza Ghalib Shayari on Love

ज़िंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं,
मैं तो मरकर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा।
कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता।
न सुनो गर बुरा कहे कोई, न कहो गर बुरा करे कोई
रोक लो गर ग़लत चले कोई, बख़्श दो गर ख़ता करे कोई।

गुज़रे हुए लम्हों को मैं इक बार तो जी लूँ,
कुछ ख़्वाब तेरी याद दिलाने ज़िंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं,
मैं तो मरकर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा।के लिए है।
गुज़रे हुए लम्हों को मैं इक बार तो जी लूँ,
कुछ ख़्वाब तेरी याद दिलाने के लिए है।
तुम सलामत रहो हज़ार बरस,
हर बरस के हो दिन पचास हज़ार।

हर दर्द में एक ख़ूबसूरती है
हर आह में एक कहानी है
ग़ालिब की तरह हमारा इश्क़ भी पुरानी है
करने गए थे उनसे तगाफुल का हम गिला,
‘की एक ही निगाह कि हम खाक हो गए।
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।
मरते है आरज़ू में मरने की, मौत आती है पर नहीं आती,
काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’ शर्म तुमको मगर नहीं आती।
Sad Mirza Ghalib Shayari

इश्क़ की सज़ा भी मिली और तमाशा भी हुआ,
ग़ालिब के शेरों में हर दर्द बयाँ हुआ।
जिसे पाया नहीं हमने उम्र भर,
उसी का नाम हर साँस में समा गया।
ग़ालिब के अशआर दिल को छू जाते हैं,
हर लफ़्ज़ में जैसे कोई आईना दिखाते हैं।
ये शायरी नहीं महज़ अल्फ़ाज़ हैं,
जिनमें हम अपना गुज़रा वक़्त पाते हैं।
कुछ इस अदा से ग़ालिब ने दर्द को बयान किया,
कि ज़ख्म भी रो पड़े और दिल मुस्कुरा दिया।
उनके कलाम में जो सच्चाई थी,
वो आज भी हर दिल को हिला दिया।

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
डरता हूं देख कर दुनिया की बेरुखी ‘ग़ालिब’,
कि अब मोहब्बतों में भी सौदागर निकलते हैं।
इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया,
वरना हम भी आदमी थे काम के।
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
कुछ दर्द थे जो बयान न हो सके,
बस वही थे जो मेरी रूह से निकलते थे।

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
कुछ दर्द थे जो बयान न हो सके,
बस वही थे जो मेरी रूह से निकलते थे।
न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता,
डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता।
तेरा ना होना भी क्या कमाल है,
तू पास होते हुए भी हर हाल में दूर होता।
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते, यही इंतज़ार होता।
तेरे जाने का ग़म कुछ इस तरह सहा हमने,
कि ज़िंदगी का हर पल सवाल होता।
दिल दिया उसको जिसने तोड़ा हर बार,
ग़ालिब की तरह बस इश्क़ को पूजा बारम्बार।
जो समझ न सका दिल का आलम,
उसने ही दिल को सबसे ज़्यादा ज़ख़्म दिया।
Mirza Ghalib Shayari on Life

हुए मर के हम जो रुस्वा हुए क्यूँ न ग़र्क़-ए-दरिया
न कभी जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता
जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है।
गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है
रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मिरे आगे
‘ग़ालिब’ छुटी शराब पर अब भी कभी कभी
पीता हूँ रोज़-ए-अब्र ओ शब-ए-माहताब में।
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले
तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए’तिबार होता।

मगर लिखवाए कोई उस को खत तो हम से लिखवाए हुई सुब्ह और घरसे कान पर रख कर कलम निकले
कहा मयखाने का दरवाज़ा ‘ग़ालिब’ और कहाँ वाइज पर इतना जानते है कल वो जाता था के हम निकले.
सादिक़ हूँ अपने क़ौल का ‘ग़ालिब’ ख़ुदा गवाह
कहता हूँ सच कि झूट की आदत नहीं मुझे

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का,
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले।
बना कर फकीरों का हम भेस ग़ालिब
तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते है.
हुए मर के हम जो रुस्वा हुए क्यूं न ग़र्क़-ए-दरिया,
न कभी जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता.
मौत का एक दिन मुअय्यन है,
नींद क्यूं रात भर नहीं आती.
Heart Touching Mirza Ghalib Shayari

आग से पानी में बुझते वक़्त उठती है सदा
हर कोई दरमांदगी में नाले से नाचार है
धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीम-तन के पाँव
रखता है ज़िद से खींच के बाहर लगन के पाँव
बिसात-ए-इज्ज़ में था एक दिल यक क़तरा ख़ूँ वो भी
सो रहता है ब-अंदाज़-ए-चकीदन सर-निगूँ वो भी

निस्यह-ओ-नक़्द-ए-दो-आलम की हक़ीक़त मालूम
ले लिया मुझ से मिरी हिम्मत-ए-आली ने मुझे
दोस्त-दार-ए-दुश्मन है ए’तिमाद-ए-दिल मा’लूम
आह बे-असर देखी नाला ना-रसा पाया
घर हमारा जो न रोते भी तो वीराँ होता
बहर गर बहर न होता तो बयाबाँ होता

मोहब्बत थी चमन से लेकिन अब ये बे-दिमाग़ी है
कि मौज-ए-बू-ए-गुल से नाक में आता है दम मेरा
दिल में फिर गिर्ये ने इक शोर उठाया ‘ग़ालिब’
आह जो क़तरा न निकला था सो तूफ़ाँ निकला
ऐ नवा-साज़-ए-तमाशा सर-ब-कफ़ जलता हूँ मैं
इक तरफ़ जलता है दिल और इक तरफ़ जलता हूँ मैं।
रश्क कहता है कि उस का ग़ैर से इख़्लास हैफ़
अक़्ल कहती है कि वो बे-मेहर किस का आश्ना
Painful Mirza Ghalib Shayari

तन्हा रातों में जब जज़्बात छलक जाते हैं
ग़ालिब के अशआर दिल में उतर जाते हैं
जब भी दिल टूटा, ग़ालिब याद आया
हर शेर उनका जैसे दिल को भाया
हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले,बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।

ग़ालिब के ख़यालों में ताज की छवि
जैसे इश्क़ में लिपटी सच्चाई
हर दिल में बस गई उसकी तन्हाई
रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज,
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं।
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।

इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया,
दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया।
उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़,
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।
है दौर-ए-क़दह वज्ह-ए-परेशानी-ए-सहबा
यक-बार लगा दो ख़ुम-ए-मय मेरे लबों से
तुम न आए तो क्या सहर न हुई,
हाँ मगर चैन से बसर न हुई।
मेरा दर्द सुना ज़माने ने,
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई।
Mirza Ghalib Shayari in English

Naam chehre se hataa kar dekhiye,
hum zamaane se kho jaayenge.
Kyuki dil mein rehne wale hain aapke,
to hum zindagi ka matlab tak badal jaayenge.
Hazaaron khwahishen thi, har ek pe jaan tak nikal jaaye,
bahut armaan poore hue, phir bhi dil ko lagge jaise kuchh kam hi paaye.
Zindagi se shikayat bas itni si rehti hai har pal,
jo mila hi nahi kabhi, wahi sabse zyada dil ko bhaaye.
Hum maante hain tum humein bhoologe kabhi nahi,
par hum mitti ban jaayenge tab tak,
jab tak tumhein hamari khabar tak milegi nahi.

Hum to fana ho gaye sirf uski aankhon ko dekh kar, Ghalib,
pata nahi wo aaine mein khud ko kaise dekh paati hogi.
Dil hi to hai, pathar ya eent thodi na,
dard se bhar na aaye to kyun?
Hum hazaar baar ro lenge,
par koi humein baar-baar sataye to kyun?
Koi umeed poori hoti nazar hi nahi aati,
koi surat dil ko tasalli deti nazar nahi aati.
Maut ka ek din to pakka hai,
phir neend raat bhar aati hi kyun nahi?

Wo mere ghar aa gaye — ye bhi Khuda ka hi karam tha,
kabhi unhe dekhte rahe hum,
kabhi apne hi ghar ko dekh kar yaqeen dhundhte rahe hum.
Ishq par zor thodi hota hai, ye aatish hai Ghalib,
jisey chaaho to jalti bhi nahi,
aur bujhane ki koshish karo to bujhti bhi nahi.
Karz pe sharab peete the, par yakeen tha ek din,
humari faaqa-masti bhi apna rang dikhaye gi.
Kahan maykhane ka darwaza, aur kahan waiz ki baatein, Ghalib,
par itna jaante hain — kal wo jaa raha tha
jab hum wahin se nikal rahe the.
Hazaaron khwahishen thi, har ek pe jaan nikal jaaye,
bahut armaan poore hue, par phir bhi dil ko lage —
kaash thodi si aur mil jaaye.
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